
अण्हयदारीपरमणदरस्स गुत्तीओ होंति तिण्णेव ।
चेट्ठिदुकामस्स पुणो समिदीओ पंच दिट्ठाओ॥1194॥
आस्रव द्वारों से विरक्त मुनि को गुप्ति त्रय होती हैं ।
चेष्टा में जो सावधान हो वर्ते उसे समिति पाँचों॥1194॥
अन्वयार्थ : बाह्यचेष्टा - प्रवृत्ति रहित साधु के तीन गुप्ति होती हैं और गमन, आगमन, शयन, आसन, आहार, निहार, विहार इत्यादि प्रवृत्ति करने के इच्छुक साधु के पंचसमिति भगवान ने दिखाई या कही हैं ।
सदासुखदासजी