+ अब मनोगुप्ति तथा वचनगुप्ति को कहते हैं- -
जा रागादिणियत्ती मणस्स जाणाहि तं मणोगुत्तिं ।
अलियादिणियत्ती वा मोणं वा होइ वचिगुत्ती॥1195॥
मन की जो रागादिक से निवृत्ति मनोगुप्ति जानो ।
नहीं बोलना झूठ तथा हो मौन वचन गुप्ति जानो॥1195॥
अन्वयार्थ : मन का राग-द्वेष-मोहादि भावों से रहित होना वह मनोगुप्ति जानना और असत्यादि वचनों से रहित वचन की प्रवृत्ति होना तथा मौन रहना वह वचनगुप्ति है ।

  सदासुखदासजी