छेत्तस्स वदी णयरस्स खाइया अहव होइ पायारो ।
तह पावस्स णिरोहो ताओ गुत्तीओ साहुस्स॥1197॥
यथा खेत की बाड़, नगर की खाई कोट, रक्षा करते ।
वैसे पाप रोकने में गुप्ती मुनि की रक्षा करती॥1197॥
अन्वयार्थ : जैसे क्षेत्र/खेत की रक्षा के लिये खेत की बाड होती है तथा नगर की रक्षा के लिये खाई अथवा प्राकार/कोट होता है, तैसे ही साधु को पाप रोकने के लिये तीन गुप्तियाँ परम उपाय हैं ।

  सदासुखदासजी