
तह्मा तिविहेण तुमं मणवचिकायप्पओगजोगम्मि ।
होहि सुसमाहिदमदी णिरंतरं ज्झाणसज्झाए॥1198॥
अतः क्षपक तुम मन-वच-काय प्रकृष्ट योग में सदा लगो ।
सावधान हो ध्यान और स्वाध्याय क्रिया में युक्त रहो॥1198॥
अन्वयार्थ : भो ज्ञानी हो! तुम मन, वचन, काय की प्रवृत्ति रोकने के लिये ध्यान तथा स्वाध्याय में मन-वचन-काय से निरन्तर अच्छी तरह सावधान होकर बुद्धि को लगाओ ।
सदासुखदासजी