
मग्गुज्जोदुपओगालम्बणसुद्धीहिं इरियदो मुणिणो ।
सुत्ताणुवीचि भणिदा इरियासमिदी पवयणम्मि॥1199॥
मार्ग शुद्धि उपयोग शुद्धि उद्योत शुद्धि आलम्बन से ।
गमन करे सूत्रानुसार मुनि ईर्या समिति कहें उसे॥1199॥
अन्वयार्थ : आचारांग सूत्र के अनुसार जो मार्गशुद्धि, उद्योतशुद्धि, उपयोगशुद्धि तथा आलम्बनशुद्धि ऐसे चार प्रकार की शुद्धतापूर्वक गमन करने वाले मुनि को भगवान के सिद्धान्त में ईर्यासमिति कही है । मार्गशुद्धता तो इसप्रकार जानना - जिस मार्ग में बहुत त्रस जीव नहीं हों; बीज, अंकुर, हरित तृण, पत्र, जल, कर्दमादि रहित हो तथा गाडा, गाडी, हाथी, घोडा, बैल, मनुष्यादि बहुत जिस मार्ग में गमन कर गये हों और अनेक मनुष्यादि की जिस मार्ग में गमनागमन की प्रवृत्ति हो तथा जिसमें उन्मत्त पुरुष, स्त्री, दुष्ट तिर्यंच मार्ग को रोककर नहीं खडे हों, ऐसे मार्ग में गमन करना । रात्रि में गमन नहीं करें तथा दीपक चन्द्रमादि के उद्योत में संयमियों का गमन नहीं होता है । इसलिए सूर्य के प्रकाश में जब मार्ग स्पष्ट दिखने लग जाये, तब चार हाथ प्रमाण भूमि को दूर से ही अवलोकन करके गमन करना तथा सूत्र की आज्ञा प्रमाण अभ्यन्तर में तो ज्ञान का उद्योत और बाह्य में सूर्य के उद्योत में गमन करना, यह उद्योत शुद्धता जाननी । और निर्दयता रहित धर्मध्यान का चिंतवन करते हुए, द्वादश भावना भाते हुए, आहार का लाभ, स्वादादि का चिंतवन नहीं करके तथा अभिमानादि दोष रहित गमन करना, उनका उपयोग शुद्धता सहित गमन जानना । वे गुरुवंदना, चैत्य वंदना तथा यतीश्वरों की वंदना के लिये गमन करते हैं । अपूर्व शास्त्र को श्रवण करने के लिए, संयम, ध्यान के योग्य क्षेत्र अवलोकन के लिये, धर्मात्मा साधु की वैयावृत्त्य के लिये, मुनिराज को एक स्थान में नहीं रहना, इसलिए अन्य धर्मरूप प्रदेशों में विहार करने के लिये तथा आहार-निहार के लिए गमन करते हैं; किन्तु वन, वृक्ष, कुआँ, बावडी, नदी, तालाब, ग्राम, नगर, महल, मकान, बाग इत्यादि का अवलोकन करने के लिए कदापि गमन नहीं करते । उन्हें अवलंबन शुद्धि होती है । तथा सूत्र के अनुसार गमन करते हैं । अति विलम्ब से गमन नहीं करते हैं और अतिशीघ्र भी गमन नहीं करते हैं । भयरहित, विस्मयरहित, क्र्रीडाविलास रहित तथा उल्लंघना, उछलना, दौडना इत्यादि दोष रहित गमन करते हैं । लम्बायमान भुजा करके गमन करते हैं । चपलता रहित ऊर्ध्व, तिर्यक् अवलोकन रहित गमन करते हैं और कंपायमान होते हुए पाषाण, ईंट, काष्ठ - उन पर पग रखकर गमन नहीं करते । बिना शोधे, बिना विचारे पैर नहीं रखते तथा मार्ग में गमन करते समय किसी से वचनालाप नहीं करते और कदाचित् बोलने का ही अवसर आ जाये तो खडे रहकर अल्प अक्षरों में धर्म के अवलम्बन सहित वचन कहते हैं । तुष, भूसा, गीला-गोबर, मल-मूत्र, तृणों का समूह/ढेर, पाषाण, काष्ठ, फलक दूर से ही टाल देते हैं तथा गाय, बैल, कूकर/स्वान, गाडी, घोडा, हाथी, भैंसा, मेंढा, गधा इत्यादि अनेक तिर्यंचों को टालकर/इनसे बचकर/दूर होकर गमन करने में प्रवीण होते हैं, उन्हें ईर्यासमिति होती है ।
सदासुखदासजी