+ अब सत्यवचन के दश भेद कहते हैं - -
जणावदसंमदिठवणा णामे रूवे पडुच्चववहारे ।
संभावणववहारे भावेणोपम्मसच्चेण॥1201॥
जनपद सम्मति नाम थापना रूप प्रतीति और व्यवहार ।
सम्भावना भाव अरु उपमा ये दस सत्य वचन प्रकार॥1201॥
अन्वयार्थ : 1. जनपदसत्य, 2. संवृत्तिसत्य, 3. स्थापनासत्य, 4. नामसत्य, 5. रूपसत्य, 6. प्रतीत्सत्य, 7. संभावनासत्य, 8. व्यवहारसत्य, 9. भावसत्य, 10. उपमासत्य - ये दश प्रकार के सत्यवचन भगवान ने कहे हैं । 1. जो अनेक देशों में जिस-जिस देश में बसनेवाले व्यवहारी लोक, उनके जो वचन, उसे जनपदसत्य कहते हैं । जैसे सीजे चावलों को महाराष्ट- में 'भातु' कहते हैं, कोई 'भेदु' कहते हैं, आंध्रप्रदेश में 'वंटकमु' कहते हैं या 'कूंड' कहते हैं । कर्णाटक देश में 'कूलु' कहते हैं, द्रविड देश में 'चोंरु' कहते हैं, मालव में या गुजरात में 'चोखा' कहते हैं । इस तरह देशदे श की भाषा में वस्तु को कहना वह जनपदसत्य है । जनपद नाम देश का है अथवा आर्य- अनार्य जो अनेक प्रकार के देश उनमें जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्षादि के स्वरूप का उपाय रूप उपदेश करने वाले वचन 'जैसे धर्म दयास्वरूप ही है' तथा राजा-राणा इत्यादि वचन, वह सब जनपदसत्य है । 2. जो वचन सर्वलोक में मान्य हो, उसे संवृत्तिसत्य कहते हैं । जैसे 'कमल' पृथ्वी, जल, पवन, बीज इत्यादि अनेक कारणों से उत्पन्न होता है, तो भी उसे सर्वलोक 'पंकज' कहते हैं । 'कमल' केवल पंक/कर्दम मात्र से ही तो उत्पन्न नहीं होता है तो भी पंकज कहना संवृत्ति सत्य हैअथवा राजा की पटरानी मनुष्यनी है तो भी सर्वलोक उसे देवी कहते हैं, यह संवृत्तिसत्य है । 3. तथा अन्यवस्तु का धर्म अन्य जो तद्रूप अथवा अतद्रूप, उसमें आरोपण करके स्थापना करते हैं, वह स्थापना सत्य है । जैसे - धातु, पाषाण के प्रतिबिम्ब में अथवा अक्षतादि में ये चन्द्रप्रभ स्वामी हैं, ऐसी मुख्य वस्तु की स्थापना करना, वह स्थापना सत्य है । 4. जो शब्द के अर्थरूप तो न हो और जैसा नाम कहते हैं, वैसे गुण भी न हों, उसमें व्यवहार की प्रसिद्धि के लिये लौकिक जनों द्वारा कहा गया है, वह नामसत्य है । जैसे किसी को देवदत्त कहा या जिनदत्त कहा तो जिनादि ने उसे दिया नहीं तो भी उसको जिनदत्त कहते हैं अथवा मनुष्य को इन्द्रराज तथा चन्द्र-सूर्य कहते हैं, चतुर्भुज कहते हैं, वह नामसत्य है । 5. जगत में नेत्रों के व्यवहार की अधिकता है, इसलिए पुद्गल के रूप गुण की प्रधानता से जो वचन कहना, वह रूपसत्य है । जैसे हंसों की पंक्ति में हंसों में रस, रुधिर, चोंच, पैर रक्त हैं तो भी श्वेत/सफेद कहना, वह रूप सत्य है । 6. कोई पदार्थ की अपेक्षा से अन्य स्वरूप कहना । जैसे कायर की अपेक्षा किसी को शूरवीर कहना, मन्दज्ञानी की अपेक्षा किसी को ज्ञानी कहना, दीर्घ की अपेक्षा किसी को ह्रस्व कहना - यह सर्व प्रतीत्यसत्य हैं । 7. असंभव के परिहारपूर्वक वस्तु के धर्म की विधि है लक्षण, जिसका ऐसी संभावना करके जो वचन कहना, वह संभावना सत्य है । जैसे इन्द्र एक तर्जनी अंगुली से मेरु को उखाड दे अथवा जम्बूद्वीप को पलट दे - ऐसा कहना, उस इन्द्र में मेरु को अंगुली से उखाडने की और जम्बूद्वीप को पलट देने की शक्ति का अभाव नहीं, परन्तु कभी क्रियान्वयन नहीं करेगा, अत: सामर्थ्य तो है ही । क्रिया की अपेक्षा बिना उस वस्तु का सामर्थ्य कहना संभावनासत्य है । 8. नैगमनय को मुख्य करके कहना, जैसे कोई पुरुष पानी भर रहा था तथा अग्नि जला रहा था, उससे किसी ने पूछा तुम क्या कर रहे हो? तब उसने कहा - भात पका रहा हूँ । अभी तो मात्र चावल ही रखे हैं, उन्हें भात कहना वह व्यवहार सत्य है । 9. भगवान के परमागम में अतींद्रिय अर्थ/पदार्थ का जो विधि-निषेध कहा गया है, उसके संकल्प रूप परिणाम को भाव कहते हैं, उसके आश्रित जो वचन, वह भावसत्य है । जैसे शुष्क/सूखा, पक्व/अग्नि में पकाया तथा गर्म किया तथा आमली/इमली, नमक जिसमें मिला दिया और चक्की, पत्थरादि सेपीसा-बाँटा गया या यंत्र में पेला गया द्रव्य प्रासुक है, उसके सेवन करने में पापबन्ध नहीं है । ऐसे पाप के त्यागरूप प्रासुक द्रव्य सर्वज्ञ भगवान ने कहे हैं । ऐसे प्रासुक द्रव्य में भी सूक्ष्म जीव आ पडें और इन्द्रियों के गोचर न हों, उनको सर्वज्ञप्रणीत आगम की प्रमाणता से शुद्ध जानना, वह भावसत्य है । 10. जिसकी गिनती नहीं की जा सके, ऐसे प्रमाण को पल्य/गड्ढा, उसकी उपमा करके कहते हैं, वह उपमासत्य है । जैसे इसकी आयु पल्यप्रमाण है तथा ग्रीष्म अग्नि है, ऐसे कहना उपमासत्य है । भाषासमिति के धारकों ने सत्य इसप्रकार सत्यवचन के दश भेद सत्य ही कहे हैं ।

  सदासुखदासजी