
तव्विवरीदं मोसं तं उभयं जत्थ सच्चमोसं तं ।
तव्विवरीया भासा असच्चमोसा हवे दिट्ठा॥1202॥
सत्-विपरीत असत्य वचन है उभय वचन सत्-असत् स्वरूप ।
उभय विरुद्ध वचन अनुभय हैं ना तो सत् ना असत् स्वरूप॥1202॥
अन्वयार्थ : जो वचन, दश प्रकार के सत्यवचन से विपरीत/उल्टा है, वह मृषावचन/ असत्यवचन है और जिसमें सत्य-असत्य दोनों हैं, वह उभयभाषा है । जैसे कमंडल को घट कहना, क्योंकि घट की तरह जलधारण स्नान-पानादि अर्थक्रिया करता है, इसलिए तो सत्य है, लेकिन घट के समान आकार तथा नामादि नहीं, इसलिए असत्य है । ऐसा उभयवचन कहा और जिसमें दोनों ही नहीं हैं, ऐसे वचन को अनुभयवचन कहा है । जैसे किसी ने कहा कि "ऐेसा मुझे क्यों प्रतिभासता है?" यहाँ सामान्यरूप से अर्थ प्रतिभासित हुआ, वह अपनी अर्थक्रियाकारी रूप विशेष निर्णय का अभाव होने से यह सत्य है, ऐसा नहीं कहा जा सकता और सामान्य प्रतिभास हुआ है, इसलिए उसे असत्य भी नहीं कहा जा सकता है । इसलिए अनुभय वचन की जाति भिन्न ही है ।
सदासुखदासजी