अन्वयार्थ : 1. आमंत्रणी, 2 आज्ञापनी, 3. याचिनी, 4. सम्पृच्छनी, 5. प्रज्ञापनी, 6. प्रत्याख्यानी, 7. इच्छानुलोमवचनी, 8. संशयवचनी, 9. अनक्षरात्मिका - ऐसे नौ प्रकार के अनुभय वचन हैं ।
- कोई पुरुष अन्य कार्य में आसक्त है - लग रहा है, उसे अपने सन्मुख करने को कहा - 'हे देवदत्त!' इत्यादि वचन वह [[आमंत्रणी भाषा]] है
- मैं तुमको आज्ञा करता हूँ/कहता हूँ, वह [[आज्ञापनी भाषा]] है
- मैं एक याचना करता हूँ, इत्यादि [[याचनी भाषा]] है
- मैं एक आप से पूछता हूँ, वह [[आपृच्छनी भाषा]] है
- मैं आपको एक बात बताता हूँ, वह [[प्रज्ञापनी भाषा]] है
- मैं एक वस्तु का त्याग करता हूँ, इत्यादि [[प्रत्याख्यानी भाषा]] है
- जैसी आपकी इच्छा है, वैसा ही मुझे करना, ऐसी [[इच्छानुलोमवचनी भाषा]] है
- यह बगुला-पंक्ति है या ध्वजा है? इत्यादि [[संशयवचनी भाषा]] है
- द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, असंज्ञी पंचेन्द्रिय, तिर्यंच तथा बालक की अक्षररहित भाषा [[अनक्षरी भाषा]] है
यह नौ प्रकार की भाषा श्रवण करनेवालों को सामान्य से तो अर्थ के एक अंश का ज्ञान हो जाता है, अत: प्रकट और विशेष अर्थ को प्रगट करने का अभाव है, अत: अप्रकट - ऐसी अनुभयभाषा है । इसमें विशेष अर्थ तो प्रगट नहीं हुआ, इससे इसे सत्य कैसे कहें? और सामान्य अर्थ प्रगट/ज्ञान हुआ, अत: इसे असत्य भी कैसे कहें? इसलिए अनुभयपना जानना । लोक में और भी अनेक प्रकार की अनुभय भाषा है, वे नौ प्रकार इन वचन में ही गर्भित हैं । कोई प्रश्न करता है कि तिर्यंचों की अनक्षरात्मक भाषा में सामान्य अर्थ के अंश का ज्ञान भी नहीं होता, तब उसे अनुभयवचन कैसे कहा? उसका उत्तर कहते हैं - जो द्वीन्द्रियादि अनक्षर भाषा बोलनेवाले जीवों के वचन सुनकर, उनके सुख-दु:ख प्रकरणादि के अवलंबन से हर्ष-विषादादि का अभिप्राय जाना जाता है । इसलिए सामान्य अर्थ को जानने से अनक्षरात्मक वचन भी अनुभयवचन है ।
यहाँ कोई प्रश्न करता है कि केवली की दिव्यध्वनि को सत्यवचन और अनुभय वचनपना कैसे संभवता है?
उसका उत्तर - भगवान की दिव्यध्वनि की उत्पत्ति में अनक्षरपना तो श्रोताजनों के कर्ण प्रदेशों तक पहुँचने के समय तक है, इसलिए अनुभयपने की सिद्धि होती है, उसके बाद श्रोताजनों के अभिप्राय के अर्थ संबंधी संशयादि का निवारण होकर सम्यग्ज्ञान की उत्पत्ति होने से सत्यवचन की सिद्धि होती है । इस तरह पंचसमितियों में भाषा समिति का वर्णन किया ।