उग्गमउप्पायणएसणाहिं पिंडमुवधि सेज्जं च ।
सोधिंतस्स य मुणिणो विसुज्झए एसणासमिदी॥1205॥
उद्गम उत्पादन एवं एषणा दोष विरहित भोजन ।
ग्रहण करे, उपकरण वसति भी - यह एषणा समिति निर्मल॥1205॥
अन्वयार्थ : आहार और उपाधि/उपकरण तथा वसतिका इनको उद्गम, उत्पादन, एषणा दोषों से रहित शोधन करने से मुनि की एषणा समिति शुद्ध होती है ।

  सदासुखदासजी