
सहसाणाभोगिददुप्पमज्जिय अपच्चवेसणा दोसो ।
परिहरमाणस्स हवे समिदी आदाणणिक्खेवो॥1206॥
सहसा अनाभोग दुप्रमार्जन तथा अप्रत्यवेक्षण को त्यागे ।
वस्तु उठाना रखना है आदान निक्षेपण समिति कहा॥1206॥
अन्वयार्थ : इतने आदाननिक्षेपण के दोष टालकर शरीर तथा उपकरणादि को उठाना-धरना करते हैं, उनके आदाननिक्षेपण समिति होती है । जो शीघ्रता से शरीरादि को उठाये, धरे, पसारे, संकोचे, वह सहसानिक्षेप दोष है । नेत्रों से देखे बिना तथा कोमल पिच्छिका से शोधे बिना उठाना, धरना वह अनाभोगित दोष है । अनादर से शोधना, बिना मन लगाये लोगों को अपनी शुद्धता दिखाने को तथा आचार मात्र जानकर जीवदया से रहित होकर शोधना, वह दुष्प्रमार्जित दोष है और बहुत समय चले जाने के बाद वस्तु को शोधना, जिसमें जीवों का निवास हो जाये, तब शोधे तथा साधु को प्रभातकाल में और अपराह्न काल में दोनों समयों में संस्तर, उपकरण शोधने की आज्ञा है । उस समय प्रमादी होकर समय निकल जाने के बाद शोधना, वह अप्रत्युपेक्षणा दोष है । इन दोषों को टालकर शरीर-पुस्तकादि उपकरण को प्रमाद रहित यत्नाचार से उठाना-धरना, उनके आदाननिक्षेपण समिति होती है ।
सदासुखदासजी