एदाहिं सदा जुत्तो समिदीहिं जगम्मि विहरमाणो हु ।
हिंसादाहिं ण लिप्पइ जीवणिकायाउले साहू॥1208॥
जीवों से अत्यन्त भरे इस जग में विचरें, श्री मुनिराज ।
पाँच समिति से भूषित उनको लगें नहीं हिंसादिक पाप॥1208॥

  सदासुखदासजी