
पउमणिपत्तं व जहा उदयेण ण लिप्पदि सिणेहगुणजुत्तं ।
तह समिदीहिं ण लिप्पइ साधू काएसु इरियंतो॥1209॥
जैसे चिकना कमल पत्र पानी में भीगे कभी नहीं ।
वैसे समितिवन्त मुनि जीवों में विचरें पर बँधें नहीं॥1209॥
अन्वयार्थ : इसप्रकार पंचसमिति पूर्वक प्रवर्तन करने वाले साधु जगत में छहकाय के जीवों से व्याप्त लोक में हिंसादि पापों से लिप्त नहीं होते । जैसे सचिक्कणता गुणसहित कमलिनी पत्र, वह जल में रहते हुए भी जल से लिप्त नहीं होता, तैसे ही पंच समितियों का पालन करने से, जीवों से व्याप्त लोक में प्रवर्तन करते हुए साधु भी हिंसादि पापों से लिप्त नहीं होते ।
सदासुखदासजी