
सरवासे वि पडंते जह दढकवचनो ण विज्झदि सरेहिं ।
तह समिदीहिं ण लिप्पइ साधू काएसु इरियंतो॥1210॥
बाणों की वर्षा हो फिर भी कवच-बद्ध को लगे नहीं ।
वैसे समितिवन्त मुनि जीवों में विचरें पर बँधें नहीं॥1210॥
अन्वयार्थ : जैसे रण के अंगण/रणसंग्राम में दृढ बक्तर/कवच धारण करनेवाला पुरुष बाणों की वर्षा होने पर भी बाणों द्वारा वेधा नहीं जाता है, तैसे ही समिति धारण करके साधु भी जीवों से व्याप्त लोक में प्रवर्तन करने पर भी पापों से लिप्त नहीं होते ।
सदासुखदासजी