पं-सदासुखदासजी
जत्थेव चरइ बालो परिहारण्हू वि चरइ तत्थेव ।
बज्झदि पुण सो बालो परिहारण्हू वि मुच्चइ सो॥1211॥
जहाँ विचरता अज्ञानी ज्ञाता-परिहार वहीं विचरें ।
अज्ञानी तो बँधे कर्म से परिहारज्ञ अबन्ध रहे॥1211॥
सदासुखदासजी