
तह्मा चेट्ठिदुकामो जइया तइया भवाहिं तं समिदो ।
समिदो हु अण्णमण्णं णादियदि खवेदि पोराणं॥1212॥
इसीलिए जब चेष्टाकामी हो तब समिति सहित वर्ताे ।
समितिवन्त नहिं बँधे कर्म से पूर्व कर्म-निर्जरा करे॥1212॥
अन्वयार्थ : जिस क्षेत्र में या विहार में, आहार-पान में, इन्द्रिय द्वारा श्रवण करने में, अवलोकन में, भोजन के आस्वादन में अज्ञानी अयत्नाचारी रागी-द्वेषी होकर प्रवर्तता है, उन्हीं में सम्यग्ज्ञानी यत्नाचारी राग-द्वेष रहित हुआ प्रवर्तन करता है । उनमें अज्ञानी तो कर्मबंध को प्राप्त होता है और ज्ञानी निर्जरा करता है । इसलिए जिस काल में गमन की इच्छा हो, वचन बोलने की, आहार, पान, शयन, आसन की तथा धरने-उठाने की इच्छा हो, उस काल में समितिरूप होकर परम यत्नाचार पूर्वक प्रवर्तन करना । समितिरूप प्रवर्तते यत्नाचारी ज्ञानी नये-नये कर्म को नहीं ग्रहण करते/बाँधते और पुराने बँधे कर्म की निर्जरा करते हैं ।
सदासुखदासजी