एदाओ अठ्ठपवयणमादाओ णाणदंसणचरित्तं ।
रक्खंति सदा मुणिणो मादा पुत्तं व पयदाओ॥1213॥
ये आठों प्रवचन मातायें दर्शन-ज्ञान-चरित निधि की ।
रक्षा करती हैं मुनियों की ज्यों माता करती सुत की॥1213॥
अन्वयार्थ : इसप्रकार पंचसमिति और तीन गुप्तिरूप अष्ट प्रवचनमातृका हैं । ये मुनीश्वरों के दर्शन-ज्ञान-चारित्रों की सदा काल रक्षा करती हैं । जैसे यत्न रखनेवाली माता पुत्र की रक्षा करती है । तैसे ही साधु के रत्नत्रय की रक्षा करनेवाली अष्ट प्रवचनमातृका है । त्रयोदश प्रकार अखंड चारित्र की आराधना करनेवाले साधु के एक-एक व्रत की रक्षा के लिये पाँच-पाँच भावनाएँ परमागम में कही हैं ।

  सदासुखदासजी