+ इसलिए अब अहिंसा महाव्रत की पाँच भावनाएँ कहते हैं - -
एसणणिक्खेवादाणिरियासमिदी तहा मणोगुत्ती ।
आलोयभोयणं वि य अहिंसाए भावणा होंति॥1214॥
समिति एषणा-ईर्या अरु आदान निक्षेपण मन-गुप्ति ।
आलोकित पानक भोजन ये रक्षा करें अहिंसा की॥1214॥
अन्वयार्थ : पूर्व में आहार की विधि जिसप्रकार वर्णन की है, तैसे ही छियालीस दोष और बत्तीस अंतराय तथा चौदह मल - इनसे रहित शुद्ध आहार ग्रहण करना, वह एषणासमिति है तथा यत्नाचारपूर्वक शरीर एवं उपकरणों को उठाना-धरना, वह आदाननिक्षेपण समिति है । निर्जन्तु भूमि में ईर्यापथ शोधकर गमन करना, वह ईर्यासमिति है । मन को अशुभध्यान से रोककर शुभध्यान में लगाना, वह मनोगुप्ति है । दिवस में नेत्रों से अवलोकन करके भोजन-पान करना, वह अलोकित भोजनपान है । जो साधु अहिंसा महाव्रत को धारण करके व्रतों की रक्षा करना चाहते हैं, वे भोजन के समय में एषणासमिति और शरीरादि को उठाते-धरते समय में आदाननिक्षेपण समिति तथा गमन के समय में ईर्यासमिति, मनोगुप्ति एवं आलोकित भोजनपान - इन पाँच भावनाओं का कभी भी विस्मरण नहीं करते ।

  सदासुखदासजी