+ आगे अचौर्य महाव्रत की पाँच भावनाएँ कहते हैं- -
अणणुण्णादग्गहणं असंगबुद्धी अणुण्णवित्ता वि ।
एदावंतियउग्गहजायण मध उग्गहाणुस्स॥1216॥
बिन आज्ञा नहिं लेना, आज्ञा से ग्रहीत में नहीं ममत्व ।
जितनी आवश्यक उपकारी उतनी वस्तु ग्रहण करे॥1216॥

  सदासुखदासजी