
वज्जणमणण्णुणदगिहप्पवेसस्स गोयरादीसु ।
उग्गहजायणमणुवीचिए तहा भावणा तइए॥1217॥
गोचरी हेतु गृह स्वामी की आज्ञा बिन घर में जाए नहीं ।
जिन आज्ञा अनुसार याचना व्रत अचौर्य भावना कही॥1217॥
अन्वयार्थ : कमंडलु, पीछी, शास्त्रादि साधर्मी को बताये बिना, आज्ञा बिना ग्रहण नहीं करना तथा आज्ञापूर्वक भी ग्रहण किये गये उपकरणादि में आसक्तता का अभाव/ग्रहण करने योग्य में भी जितने का प्रयोजन है, उतना मात्र याचना करना तथा ग्रहण करने योग्य में ग्रहण करने की बुद्धि अथवा बिना बताये साधर्मियों के उपकरणादि का ग्रहण नहीं करना और गोचरी के अवसर में भी गृहस्थ की आज्ञा बिना गृहस्थ के घर में प्रवेश नहीं करना, सूत्र/आगम के अनुकूल वस्तु का ग्रहण करना - ये अचौर्य महाव्रत की पाँच भावनायें हैं ।
सदासुखदासजी