
महिलालोयणपुव्वरदिसरणं संसत्तवसहिविकहाहिं ।
पणिदरसेहिं य विरदी भावणा पंच बंभस्स॥1218॥
नारी दर्शन, पूर्व रति-स्मरण, संग वास एवं विकथा ।
पौष्टिक रस से विरति पाँच ये ब्रह्मचर्य व्रत की भावना॥1218॥
अन्वयार्थ : ब्रह्मचर्यव्रत की पंच भावनाएँ भाने योग्य हैं ।
सदासुखदासजी