
अपडिग्गहस्स मुणिणो सद्दफरिसरसयरूवगंधेसु ।
रागद्दोसादीणां परिहारो भावणा हुंति॥1219॥
शब्द रूप रस गन्ध स्पर्श में राग-द्वेष नहिं करें मुनी ।
अपरिग्रह व्रत की दृढ़ता के लिए पाँच भावना कही॥1219॥
अन्वयार्थ : परिग्रह त्यागी साधु को शब्द, स्पर्श, रस, रूप, गन्ध - इन पंच इन्द्रियों के विषयों में जो सुन्दर हैं, उनमें राग का त्याग करना और अमनोज्ञ में द्वेष का त्याग करना, ये परिग्रहत्याग महाव्रत की पंच भावनाएँ हैं ।
सदासुखदासजी