+ अब भावना की महिमा कहते हैं - -
ण करेदि भावणाभाविदो खु पीडं वदाण सव्वेसिं ।
साधु पासुत्तो समुद्धो व किमिदाणि वेदंतो॥1220॥
ण करिेद भावणाभोवदाि खु िीडं वदाण सव्विसिं ।
साधु िासुत्ताि समुद्धाि व ेकेमदोण वदिंताि॥1220॥
अन्वयार्थ : एक-एक व्रत की पंच-पंच भावना भाते हुए साधु शयन करने में भी तथा मूर्च्छित हो जाने पर भी समस्त व्रतों को घात नहीं करते हैं, तो साक्षात् भावना भाने वालों के व्रत मलिन कैसे होंगे? व्रतों की उज्ज्वलता ही होती है ।

  सदासुखदासजी