एदाहिं भावणाहिं हु तह्मा भावेहिं अप्पमत्तो तं ।
अच्छिद्दाणि अखंडाणि ते भविस्संति हु वदाणि॥1221॥
अतः क्षपक तुम अप्रमत्त हो सदा भावनायें भाओ ।
व्रत होंगे सम्पूर्ण तुम्हारे और निरन्तर बने रहें॥1221॥
अन्वयार्थ : इसलिए भो मुने! इन पच्चीस भावनाओं की प्रमाद रहित होकर निरन्तर भावना करो । तुम्हारे छिद्र रहित/खंडित हुए बिना निरन्तर अखंड व्रत पूर्ण होयेंगे । क्योंकि नि:शल्य/ शल्यरहित के व्रत होते हैं; इसलिए माया, मिथ्यात्व, निदान - इन तीन प्रकार की शल्यों का निवारण करो, ऐसा कहते हैं ।

  सदासुखदासजी