
तत्थं णिदणं तिविहं होइ पसत्थापसत्थ भोगकदं ।
तिविधंपि तं णिदाणं परिपंथो सिद्धिमग्गस्स॥1223॥
अप्रशस्त एवं प्रशस्त अरु भोगों की अभिलाषा कृत ।
ये तीनों निदान शल्य ही विघ्न करें शिवपुर पथ में॥1223॥
अन्वयार्थ : उन तीन शल्यों में निदान शल्य तीन प्रकार की है । एक प्रशस्तनिदान, दूसरा अप्रशस्तनिदान, तीसरा भोगकृतनिदान । ये तीनों प्रकार के निदान, निर्वाण का मार्ग जो रत्नत्रय, उसमें विघ्नकारक हैं - रत्नत्रय का विनाश करने वाले हैं ।
सदासुखदासजी