
संजमहेदु पुरिसत्तसत्तबलविरियसंद्यदणबुद्धी ।
साव अबंधुकुलादीणि णिदाणं होदि हु पसत्थं॥1224॥
संयम में निमित्त पौरुष उत्साह वीर्य उत्तम संहनन ।
बल बुद्धि श्रावक कुल बन्धु मुझे मिलें प्रशस्त निदान॥1224॥
अन्वयार्थ : जो संयम धारण करने के लिये अन्य जन्म में पुरुषार्थ, उत्साह, शरीर से उत्पन्न बल, वीर्यान्तराय के क्षयोपशम से उत्पन्न वीर्य, वज्रवृषभनाराच जो उत्तम संहनन, उत्तम बुद्धि, श्रावकधर्म, धर्म में सहायी बन्धुजन या बन्धुजनों का अभाव तथा निर्वाण के योग्य निर्मल कुलादि की चाह करना, वह प्रशस्तनिदान है ।
सदासुखदासजी