
उमाणेण जाइकुलरूवमादि आइरियगणधरजिणत्तं ।
सोभग्गाणादेयं पत्थंेतो अप्पसत्थं तु॥1225॥
मान पूर्वक जाति रूप आचार्य तथा गणधर जिनपद ।
आज्ञा अरु आदेय तथा सौभाग्य चाहना है अप्रशस्त॥1225॥
अन्वयार्थ : और जो अभिमान से उत्तम जाति, उत्तम कुल, उत्तम रूप, उत्तम बुद्धि, आचार्यपना, गणधरपना, तीर्थंकरपना, सौभाग्य, आज्ञा तथा आदर की प्रार्थना करता है, उसको अप्रशस्तनिदान होता है ।
सदासुखदासजी