
देविगमाणुसभोगो णारिस्सरसिठ्ठिसत्थवाहत्तं ।
केसवचक्कधरत्तं पच्छंतो होदि भोगकदं॥1227॥
देव मनुज के भोग तथा नारीत्व ईश्वर श्रेष्ठिपना ।
सार्थवाह नारायण चक्रवर्ति की वांछा भोग निदान॥1227॥
अन्वयार्थ : देवों का भोग, मनुष्यों का भोग, नारियों का ईश्वरपना, श्रेष्ठीपना, संघ का जाति-कुल के अधिपतिपने की, केशवपने की तथा चक्रवर्तीपने की प्रार्थना करना, उसके भोगकृतनिदान होता है ।
सदासुखदासजी