
संजमहिरारूढो घोरतवपरक्कमो तिगुत्तोवि ।
पगरिज्ज जइ णिदाणं सोवि य वढ्ढेइ दीहसंसारं॥1228॥
संयम शिखरारूढ़ घोर तप-पराक्रमी त्रिगुप्ति धारी ।
वृद्धि करें अपना संसार निदान करें यदि साधू भी॥1228॥
अन्वयार्थ : जो संयम के शिखर पर चढा हो, घोर तप, घोर पराक्रम का धारक हो तथा तीन गुप्तियों का धारक हो, ऐसे उत्कृष्ट चारित्र का धारक साधु भी कदाचित् निदान करे तो दीर्घ संसार की वृद्धि करता है, बहुत काल तक संसार परिभ्रमण करता है तो अल्प चारित्र के धारक निदान करें तो बहुत काल पर्यंत संसार-परिभ्रमण नहीं करेंगे क्या? करेंगे ही करेंगे ।
सदासुखदासजी