जो अप्पसुक्खहेदुं कुणइ णिदाणमविगणियपरमसुहं ।
सो कागणीए विक्केइ मणिं वहुकोडिसयमोल्लं॥1229॥
मात्र अल्पसुख हेतु निदान करे जो परम सौख्य को छोड़ ।
वह बहुमूल्यवान मणि को कौड़ी में ही देता है छोड़॥1229॥
अन्वयार्थ : जो इन्द्रियजनित अल्पसुख के लिये आत्मिक-अतीन्द्रिय-निर्वाण के सुख की अवज्ञा/अवहेलना करके निदान करता है, वह अनेक करोड धन है मूल्य/कीमत जिसकी, ऐसी मणि को एक काैंडी में या एक दमडी में बेच देता है ।

  सदासुखदासजी