
सो भिंदइ लोहत्थं णावं भिंदइ मणिं च सुत्तत्थं ।
छारकदे गोसीरं डहदि णिदाणं खु जो कुणदि॥1230॥
लौह कील के लिए रत्न से भरी नाव को देता तोड़ ।
भस्म हेतु गोशीर जलाये, सूत्र हेतु मणिमाला तोड़॥1230॥
अन्वयार्थ : जो धर्मात्मा होकर निदान करता है, वह अनेक रत्नों की भरी 'समुद्र में गमन करती' नाव को लोह के लिये भेदता/तोडता है तथा सूत के लिये मणिमय हार को तोडता है और भस्म/राख के लिये बहुत दुर्लभ गोसीर नामक चन्दन को जलाता है ।
सदासुखदासजी