
कोढी संतो लद्धूण डहइ उच्छुं रसायणं एसो ।
सो सामण्णं णासेइ भोगहेदुं णिदाणेण॥1231॥
भोग हेतु करता निदान जो भवनाशक श्रामण्य नशे ।
जैसे कोढ़ी रोग विनाशक इक्षुरसायन नष्ट करे॥1231॥
अन्वयार्थ : जो परम रसायन मुनिपने को भोगों के निमित्त निदान करके नाश करता है, वह पुरुष जैसे कोई कोढी मनुष्य रसायनरूप इक्षुरस को प्राप्त करके भी उसे ढोल देता है/व्यर्थ गँवा देता है, तैसा जानना ।
सदासुखदासजी