
पुरिसत्तादिणिदाणं पि मोक्खकामा मुणी ण इच्छंति ।
जं पुरिसत्ताइमओ भावो भवमओ य संसारो॥1232॥
पुरुषत्वादि निदान न करते मुनिगण शिवसुख अभिलाषी ।
क्योंकि पुरुष पर्याय भवात्मक और भवात्मक यह जग भी॥1232॥
अन्वयार्थ : मोक्ष का इच्छुक मुनि पुरुषलिंग तथा उत्तम संहननादि पाने का भी निदान नहीं करता । क्योंकि पुरुषलिंग, पुरुषार्थ, संहननादि सभी भव हैं और भवमय संसार है । इसलिए जो पुरुषलिंग, संहननादि की वांछा करके निदान करता है, वह संसार की चाह करता है । अत: वे वीतरागी मुनि पुरुषार्थादिकों की वांछा नहीं करते ।
सदासुखदासजी