
दुक्खक्खयकम्मक्खयसमाधिमरणं च बोधिलाभो य ।
एयं पत्थेयव्वं ण पच्छणीयं तओ अण्णं॥1233॥
दुःखक्षय हो अरु कर्मनाश हो बोधिलाभ हो मरण समाधि ।
करने लायक यही प्रार्थना अन्य न कुछ भी आदरणीय॥1233॥
अन्वयार्थ : हमारे शरीर धारणादि, जन्म-मरणादि तथा क्षुधा, तृषा, काम, रागादि जो दु:ख हैं, इनका क्षय होओ और अनादि से आत्मा को पराधीन करने वाले मोहनीयादि कर्म का क्षय हो तथा रत्नत्रयसहित मरण हो, हमें बोधि अर्थात् रत्नत्रय का लाभ हो । सम्यग्दृष्टि को इतनी प्रार्थना करने योग्य है, इनके अलावा इस भव-परभव की कुछ भी प्रार्थना/इच्छा करने योग्य नहीं है ।
सदासुखदासजी