
पुरिसत्तादीणि पुणो संजमलाभो य होइ परलोए ।
आराधयस्स णियमा तदत्थमकदे णिदाणे वि॥1234॥
आराधक नहिं करे निदान तथापि उसे निश्चित मिलते ।
पुरुषत्वादि तथा संयम का लाभ उसे हो परभव में॥1234॥
अन्वयार्थ : आराधना को आराधने वाले मनुष्य के पुरुषार्थादि के लिये निदान नहीं करने पर भी नियम से परलोक में पुरुषलिंगादि और संयम का लाभ होता ही है ।
सदासुखदासजी