माणस्स भंजणात्थं चिंतेदव्वो सरीरणिव्वेदो ।
दोसा माणस्स तहा तहेव संसारणिव्वेदो॥1235॥
मान कषाय विनाश हेतु इस तन से रखो अनादर भाव ।
चिन्तन करो मान के दोषों का संसार अनादर का॥1235॥
अन्वयार्थ : मान का ही दोष है ।

  सदासुखदासजी