
कालमणंतं णीचागोदो होदूण लहइ सगिमुच्चं ।
जोणीमिदरसलागं ताओ वि गदा अणंताओ॥1236॥
नीच उच्चकुल प्राप्त करे अरु उच्च नीच कुल में जाता ।
जीवों का कुल मानो पथिकों का विश्राम स्थल जैसा॥1236॥
अन्वयार्थ : संसार-परिभ्रमण करने वाला जो संसारी जीव, वह अनन्तकालपर्यंत अनन्तबार नीच गोत्र का धारक हुआ, तब एक बार उच्चगोत्र को धारण करता है । ऐसे ही अनन्तबार नीचयोनि धारण करता है, तब एक बार उच्चयोनि धारण करता है । अनन्तबार उच्चयोनि का धारक भी हो गया, इस प्रकार नीच-उच्च अनादि से होता आ रहा है । इतना विशेष है कि जब नीचयोनि अनन्तबार पा लेता है, तब एक बार उच्चयोनि पाता है, इसलिए कुल का अभिमान करना वृथा है ।
सदासुखदासजी