
उच्चासु व णीचासु व जोणीसु ण तस्स अत्थि जीवस्स ।
वड्ढी वा हाणी वा सव्वत्थ वि तित्तिओ चेव॥1237॥
ऊँची या नीची योनि में जो जन्मे उन जीवों की ।
वृद्धि अथवा हानि व कुछ भी जीव सब जगह वैसा ही॥1237॥
अन्वयार्थ : उच्चयोनि या नीचयोनि कोई भी योनि प्राप्त हो, उसमें जीव की कुछ वृद्धि या हानि नहीं होती, सभी योनियों में असंख्यातप्रदेशी ही रहता है ।
सदासुखदासजी