णीचो वि होइ उच्चो उच्चो णीचतणं पुण उवेइ ।
जीवाणं खु कुलाइं पधियस्स व विस्समंताणं॥1238॥
काल अनन्ते नीच गोत्र में जन्मे ऊँच गोत्र इक बार ।
इस क्रम से यह जन्म ले चुका उच्च गोत्र में अनन्त बार॥1238॥
अन्वयार्थ : नीच कूकर, सूकर, चांडालिदिकों की योनि को प्राप्त होता है, फिर उच्च देव, मनुष्य, ब्राह्मण-क्षत्रियादि योनि को प्राप्त होता है । कभी उच्च कुल को प्राप्त होता है, कभी नीचकुल को प्राप्त होता है । जैसे मार्ग में गमन करनेवाला पथिक एक विश्रामस्थान को छोडकर दूसरे स्थान को प्राप्त होता है, फिर उसे भी छोडकर अन्य स्थान को प्राप्त होता है । तैसे ही नीच-उच्च कुल में जीव का परिभ्रमण जानना ।

  सदासुखदासजी