
बहुसो वि लद्धविजडे को उच्चतम्मि विब्भओ णाम ।
बहुसो वि लद्धविजडे णीचत्ते चावि किं दुक्खं॥1239॥
अनन्त बार पाया-छोड़ा इस ऊँचे कुल का कैसा गर्व ।
अनन्त बार पाया-छोड़ा इस नीचे कुल का कैसा दुःख॥1239॥
अन्वयार्थ : जिस उच्च कुल को अनेक बार प्राप्त कर-करके त्याग दिया है तो अब उस उच्चकुल को पाने में क्या विस्मय है? और जिस नीचकुल को अनेकबार पाकर छोड दिया, उस नीचकुल के मिलने से क्या दु:ख है?
सदासुखदासजी