
उच्चत्तणम्मि पीदी संकप्पवसेण होइ जीवस्स ।
णीचत्तणे ण दुक्खं तह होइ कसायबहुलस्स॥1240॥
ऊँच गोत्र में अपनेपन से जीवों को होता अनुराग ।
नीच गोत्र में भी दुःख का कारण होती अति मान कषाय॥1240॥
अन्वयार्थ : इस तीव्र मानादि कषाय के धारक जीव के उच्चपने में भी संकल्प के कारण प्रीति-आनन्द होता है कि "मैं उच्चकुल में उपजा हूँ तथा पूज्य हूँ, उच्च हूँ" और नीचपने में भी उसीप्रकार संकल्प के कारण दु:ख होता है कि "हाय! मैं इन लोकों से नीचा हूँ" ऐसा नीच-उच्चपना भी कषायी जीव को संकल्प के कारण से होता है । यदि निश्चय से देखा जाये तो आत्मा नीचा-ऊँचा है ही नहीं, अभिमान से अपने को नीचा-ऊँचा मानता है ।
सदासुखदासजी