उच्चत्तणं व जो णीचत्तं पिच्छेज्ज भावदो तस्स ।
उच्चत्तणे य णीचतणे वि पीदी ण किं होज्ज॥1241॥
नीच गोत्र को भी जो अपने मन में देखे उच्च समान ।
क्यों न उसे हो नीच गोत्र में प्रीति भाव भी उच्च समान॥1241॥
अन्वयार्थ : जो जीव उच्चपने के समान ही नीचपने को, भावों से देखता है, उसे उच्चपने में तथा नीचपने में, दोनों में सुख होता है । जिसे उच्च-नीचपना दोनों ही आत्मा से भिन्न कर्म के किये हुए हैं, ऐसा चिंतवन होता है, उसे अपना नीचपना देखकर दु:ख नहीं होता, स्वयं का निर्धनपना, अकुलीनपना तथा आदर का अभाव देखकर भी आनन्दरूप ही रहता है ।

  सदासुखदासजी