णीच्चत्तणं व जो उच्चत्तं पेच्छेज्ज भावदो तस्स ।
णीचत्तणेव उच्चतणे वि दुक्खं ण किं होज्ज॥1242॥
उच्च गोत्र को भी जो अपने मन में देखे नीच समान ।
क्यों न उसे हो उच्च गोत्र में दुख वेदन भी नीच समान॥1242॥
अन्वयार्थ : जो जीव उच्चपने को नीचपने के समान भावों से देखता है, उसके नीचत्वउच्चत्व दोनों ही अवस्था में दु:ख नहीं होता है क्या? होता ही है । उच्च-नीचपने का सुखदु: ख तो भावों के संकल्प से होता है, अन्य कारण से नहीं ।

  सदासुखदासजी