
तह्मा ण उच्चणीचत्तणाइं पीदिं करेंति दुक्खं वा ।
संकप्पो से पीदीं करेदि दुक्खं च जीवस्स॥1243॥
अतः उच्च या नीच कुलों से सुख या दुःख उत्पन्न न हों ।
किन्तु स्वयं के संकल्पों से ही जीवों को सुख दुःख हों॥1243॥
अन्वयार्थ : इसलिए उच्चपना जीव को प्रीति नहीं कराता है और नीचपना दु:ख नहीं कराता है । सुख और दु:ख जीव के संकल्पों से होता है ।
सदासुखदासजी