
कुणदि य माणो णीचागोदं पुरिसं भवेसु बहुएसु ।
पत्ता हु णीचजोणी बहुसो माणेण लच्छिमदी॥1244॥
मान कषाय जीव को बहु जन्मों में करे नीच गोत्री ।
नीच गोत्र में भव भव जन्मी मान भाव से लक्ष्मीमति॥1244॥
अन्वयार्थ : मान कषाय इस जीव को अनेक भवों में नीच गोत्ररूप चांडाल, भीलादि के कुल में तथा ग्राम सूकर, कूकरादि अधम तिर्यंचों में, नारकियों में बारंबार उत्पन्न कराती है । जैसे लक्ष्मीमति ब्राह्मणी मानकषाय के कारण अनेक बार नीचयोनियों को प्राप्त हुई ।
सदासुखदासजी