
पूयावमाणरूवविरूवं सुभगत्तदुभगत्तं च ।
आणाणाणा य तहा विधिणा तेणे व पडिसेज्ज॥1245॥
पूजा अरु अपमान सुरूप-कुरूप सुभाग्य तथा दुर्भाग्य ।
स्वामी-सेवक में भी कुलवत् प्रीति-अप्रीति न करने योग्य॥1245॥
अन्वयार्थ : पूज्यपना, अपमान, रूप, कुरूप, सौभाग्य, दुर्भाग्य, आज्ञा, अनाज्ञा, जिसप्रकार बने त्यागने योग्य ही है ।
सदासुखदासजी