
इच्चेवमादि अविचिंतयदो माणो हवेज्ज पुरिसस्स ।
एदे सम्मं अत्थे पसदो णो होइ माणो हु॥1246॥
वस्तु स्वरूप विचार करे नहिं उसको होती मान कषाय ।
किन्तु वस्तु को देखे सम्यक् उसे न होती मान कषाय॥1246॥
अन्वयार्थ : इत्यादि/पूर्वोक्त दोषों का विचार नहीं करनेवाले पुरुष को अभिमान होता है और इतने पदार्थ का सत्यार्थ अवलोकन करनेवाले पुरुष को मान नहीं होता है ।
सदासुखदासजी