
जइदा उच्चत्तादिणिदाणं संसारवड्ढणं होदि ।
कह दीहं ण करिस्सदि संसारं परवधणिदाणं॥1247॥
उच्चकुलादिक के निदान से भी जब बढ़ता है संसार ।
पर-वध करने के निदान से तो फिर क्यों न बढ़े संसार॥1247॥
अन्वयार्थ : जब उच्चगोत्रादिरूप अपने उच्चपने का निदान करना ही संसार को बढानेवाला होता है तो पर जीवों का घात करने का निदान संसार कैसे नहीं बढायेगा?
सदासुखदासजी