
आयरियत्तादिणिदाणं वि कदे णत्थि तस्स तम्मि भवे ।
धणिदं पि संजमंतस्स झिज्झणं माणदोसेण॥1248॥
आचार्यत्वादिक निदान से मान दोष के कारण से ।
संयमधारी हो परन्तु उस भव में सिद्धि नहीं मिले॥1248॥
अन्वयार्थ : आचार्यत्वादि पद की चाह भी मानकषाय की तीव्रता से होती है, इसलिए जिसे अभिमान की तीव्रता है, उसकी अनेक जन्मों में भी सिद्धि होना दुर्लभ है । जो जीव भोगों में दोष हैं - ऐसा चिंतवन करते हैं, उनके भोगों की वांछारूप निदान नहीं होता ।
सदासुखदासजी