
भोगणिदाणेण य सामण्णं भोगत्थमेव होइ कदं ।
साहोलंवो जह अत्थिदो वि णेको वि भोगत्थं॥1250॥
भोगों का निदान करने से भोग हेतु श्रामण्य हुआ ।
जैसे वन में कोई पथिक शाखा-फल खाने हेतु रुका॥1250॥
अन्वयार्थ : भोगों का निदान करके जो मुनिपना धारण करता है, उसका मुनिपना तो भोगों के लिये ही धारण करना हुआ, कर्म के क्षय के लिये नहीं हुआ । भोगों के राग से जिसका चित्त व्याकुल है, उसके नवीन कर्म का प्रवाह आ रहा है, निर्जरा होनी तो अति दूर रह गई । जैसे वन में किसी साहालंग नामक तपस्वी ने भोगों के लिये निदान किया । इसकी जो कथा है, वह आगम से जान लेना ।
सदासुखदासजी