
आवडणत्थं जह ओसरणं मेसस्स होइ मे सादो ।
सणिदाणबंभचेरं अव्बंभत्थं तहा होइ॥1251॥
ज्यों मेढ़ा पीछे हट कर दूजे मेढ़े पर करे प्रहार ।
त्यों मैथुन के लिए यति का ब्रह्मचर्य यदि करे निदान॥1251॥
अन्वयार्थ : जैसे मेष/बकरा अन्य बकरे से दूर जाता है1, उल्टे पैरों बहुत दूर चला जाता है । वह परस्पर मस्तक के आघात के लिए ही है । उसीप्रकार निदान सहित ब्रह्मचर्य का धारण करना वह अब्रह्म के लिए ही है; क्योंकि इससे वह अनन्त भवों तक संसार में परिभ्रमण करेगा ।
सदासुखदासजी